“जंगल से आती लाल आवाज़ “
जंगल से आती सारी आवाजों का रंग देखा है मैंने ;
शहर का हूँ इसलिए अव्वाज़ सुनिए नहीं देती दीखाइए देती है ;
पहली आवाज़ का रंग हरा था ;
उन् आवाजों से भला कौन डरा था |
शहर बदला , इंसान जंगल मे और जानवर शहर मे रहने लगे
और बदलते शहर की आवाज़ों के रंग ने
जंगल की आवाजों का रंग बदला ;
जंगल के हरे रंग मे पवित्रता थी
पर शहर के हरे रंग मे कुटिलता |
जंगल से फिर शहेरी हरे रंग की आवाज़ आने लगी ;
फिर उस आवाज़ का रंग पीला हुआ |
फिर आई “काले” रंग की आवाज़ ;
शहर के “तिरंगे ” रंग के आवाज़ के अंदर
वह काले रंग की आवाज़ खो से गयी |
शहर के जानवर कहते थे की सभी खुश है ;
“जंगल के इंसान भी “पर जाने क्यों अब कई सालों से जंगल से
लाल रंग की आवाज़ आती है |
शहर के जानवर अब जंगल के इंसानों
के शिकार पे निकले है
पर जाने क्यों जंगल से आती वह लाल आवाज़ थमती ही नहीं |
