गणतंत्र दिवस पे बहादुरी का करतब

२६ जनवरी २०१४ की सुबह ठण्ड गई नहीं थी पर हाँ, धूप का नामो-निशान न था । दिल्ली मे परेड शुरू हो चुकी थी और भैया भी गरम जलेबियाँ ले कर आ चुके थे । किचन से पूरियाँ छानने कि आवाज़ आनी शुरू हो चुकी थी और फिर मम्मी कि आवाज़ आयी ,” फटाफट सब नहा धो लो, हमको भी परेड देखना है” ।

दिल्ली की परेड के साथ-साथ घर मे जलेबी-पूरी की परेड भी शुरू  हो गयी । “अरे छोटका अपन राज्य के झांकी आये तो हमको बुलाना”, मम्मी ने थाली मे पूरी डालते हुए कहा । पापा जलेबी की मिठास के साथ अख़बार के पन्ने पलटते हुए बोले,”इस बार तो दो लोगो को अपने शहर से पदमश्री मिला है” ।

“पर पापा इस बार के पदम् भूषण और विभूषण् मे तो अपने शहर से कोइयो नाम नहीं है “, भैया जलेबी को पूरी मे लपेटते हुए बोले। दीदी हॅसते हुई बोलीं ,”सारे पुरुष्कार अपने शहर को ही दे देना चाहिए, है ना?” और फिर मम्मी को पुकारा, “मम्मी जल्दी आओ अपने शहर की झांकी आयी” ।

सेना की टुकड़ियां साधे ताल की तरह मोहित कर देने वाला मार्च कर रही थीं,सेना कि गाडी पे रख कर नए टैंक और मिसाइल को भी दर्शाया जा रहा था । मम्मी अपने दिनों मे विदयालय के दर्शन ज्यादा नहीं कर पायीं थी, सो उन्होंने ने उत्सुक्तावस पूछा, ” छोटू के पापा आप बोले थे कि ई दिन ‘जन’ का दिन होता है त सेना काहे परेड करता है?” । “अरे ! देश पूरी दुनिया को ऐसे अपनी ताकत देखता है, सेना कि ताकत मतलब जनता की ताकत “, पापा टीवी से बिना नज़र हटाये बोले ।

मम्मी जाने कुछ सोचते हुए धीरे से बोलीं ,” न! जनता की बहादुरी तो दूसरी है । हम तो रोज़ किचन कि खिड़की से ऐसा बहादुरी देखते है। “

इस बात ने सारे जालेबी और परेड मे डूबे लोगों का ध्यान खीचा । “का बोल रही हो ?”, उलझे चहेरे से पापा ने पूछा । टीवी पे अब डेयर-डेविल्स मोटरसाइकिल पे अचंबित कर देने वाले करतब देखला रहे थे, दिवस अपने चरम पे था । पर मम्मी तो कहीं खो से गयीं थी । “त !बोल के चुप हो गयी, किचन से कौन बहादुरी का करतब देखता है ?हमलोग को भी बताओ । “, पापा ने मम्मी को धीरे से झंझोलते हुए कहा । मम्मी मुस्करा कर घडी कि ओर देखते हुए बोलीं, ” चलिए समय भी हो गया है, बताना का देखा ही देते है” ।

किचन की खिड़की से घर के बगल का एक खाली प्लाट नज़र आता था , जो काई लगे पानी और सारे घरो से फेंके कूड़े से ऊपर तक भर आया था । “आप बहादुरी दिखाने वालीं थीं “, भैया धीरे से बोले । मम्मी मुस्कारते हुए बोलीं ,”देखते रहो !” ।

थोड़ी देर मे दो अधनंगे बच्चे एक बड़ा सा बोरा ले कर आये, और कड़क ठण्ड मे अपने वो थोड़े कपडे भी उतार उस काई लगे बर्फ से ठन्डे पानी मे उतर गए और बीच मे जा कर पानी मे तैरती फेकी प्लास्टिक इकठा करने लगे। पानी उन बच्चो की छाती को छू रहा था और देख कर ही कनकनी किचन मे खड़े लोगो को हो रही थी ।

उधर टीवी मे डेयर-डेविल्स के करतब पे, दिल्ली मे लोग तालियाँ पीटते दीख  रहे थे ।

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About Prashant Sagar

The RIGHT was never right.There was nothing left in the LEFT. Thus here is a boy opening the gift boxes of horizons in search of a new ideology.

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