कई महीनों बाद उसका फोन था । तुम्हारे जन्म दिन का गिफ्ट मैंने लिया था कैसे भिजवाऊँ के जवाब में ” मैं गिफ्ट सिर्फ उससे लेता जिसे दे सकूं ” कहकर चुप हुआ ही था कि पलट कर वो फिर बोली ‘ तो क्या करूं उसका ? ‘ … सोचा खामोशी को ही जवाब देने दें …. लेकिन उसने फिर चोट की , कुरेदते हुए बोली ‘ बताओ क्या करें उसका ? ‘ .. समंदर की वापस लौटती लहरों के स्वर में बोल उठा ‘ किसी और को दे देना ‘ … उधर से आवाज आई – ” नहीं , वो हम आपके लिए लाये थे … रख लेंगे उन्हें अपने पास ‘ हमेशा ‘ ” … उस दिन पता चला रेत पर लिखे नाम लहरें मिटाने नहीं आती अपने साथ ले जाती है ‘ हमेशा ‘ के लिए शायद तब तक जब तक समंदर का अस्तित्व है
