“अबे ओ सोमी , इधर आ” , उस कड़कदार आवाज़ ने, सड़क पे जाते एक अधेड़ व्यक्ति को एकदम से रोक दिया.
“ये सामान जरा ऊपर तक पहुंचवा दे, इस मतई के शरीर में तो जैसे जान ही नहीं है” भजनलाल अपने नौकर मतई की ओर आंखे तरेरते हुए बोले.
वह जब मतई की मदद कर के लौटने लगा तो भजनलाल बोले, “क्या अपनी बची हुई उम्र भी चित्रकारी कर के ही गुजारनी है, मेरी दुकान पे लग जा, ज्यादा ही कमा लेगा”
सोमी बिना कुछ बोले नजरें झुकाए निकल आया.
वैसे तो उसके माँ बाप ने उसका नाम सोमदेव रखा था, परन्तु लोगों को उसके लिए सोमी प्रयोग करना ज्यादा सरल लगा , और फिर सोमदेव नाम उसके रंग-रूप और हैसियत से मेल भी कहाँ खाता था .
वह अकेला था, बच्चे उसके हुए नहीं और बीवी किसी जहरीले जंतु के काट लेने से कई वर्ष पहले ही चल बसी थी.
एक भैंस और झोंपड़ी के सिवा उसके पास कुछ ख़ास था नहीं, सिवाए एक कला के.
बचपन से ही रंगों के साथ उसका गजब का रिश्ता था, जब वह रंग बिरंगे चित्र बनाता तो ऐसा प्रतीत होता मानो सारे रंग जैसे उसके इशारे पे नाच रहे हों .
उसने इसी कला को अपनी आजीविका का साधन बना लिया था, शादी ब्याह में दीवारों पे देवी-देवताओं के चित्र बना कर वह अपने जीने भर का जुगाड़ कर लेता था. पिछले कुछ समय से लोग अपने घरों पे रंग बिरंगे चित्र बनवाने लगे थे. उसी के चलते उसे आज तक किसी के यहाँ मजदूरी नहीं करनी पड़ी.
भले ही उसे सब दुत्कार कर पुकारते थे, पर गाँव में दो-चार लोग थे जो उसकी कला की कद्र करते थे, और हमेशा शहर जाकर बेहतर जीवन जीने के लिए कहते थे. परन्तु उसकी कभी हिम्मत नहीं हुई शहर जाने की, अनजान दुनिया का डर जो था उसे.
एक बार उसे सरकारी स्कूल के मास्टरजी ने प्यार से बुलाया और कहा,” तुम इतने बढ़िया रंग करते हो ,क्यों नहीं हर साल नव वर्ष के मौके पे आयोजित होने वाली प्रतियोगिता में हिस्सा लेते ?”
वह एक आह भर के बोला, “परन्तु मास्टरजी उसके लिए तो हमको शहर जाना पड़ेगा, और भला हमे वहां कौन पूछेगा, शहर में तो बहुत बढ़िया- बढ़िया रंग भरने वाले होंगे, हमारा उनसे भला क्या मेल”.
“ऐसा नहीं है सोमी, तुम इस बार जरूर जाओगे, मैं तुम्हे सामान ला दूंगा, और फिर शहर तो यहाँ से सिर्फ पांच किलोमीटर है”, मास्टरजी बोले.
दो दिन बाद एक लड़का आकर उसे लकड़ी के चौखटे पे लगा एक सफ़ेद रंग का तंग कपडा दे गया, और बोला की ये मास्टरजी ने उसके लिए भेजा है.
पहले तो उसे समझ ही नहीं आया की ये क्या बला है, फिर उसे समझ आया की जरूर इसी पे चित्र बना कर उसे शहर ले जाना हैं.
उसने वह चौखटा अपनी खाट के पास रखा और भारी मन से बाहर चला गया, उसे बड़ी उलझन महसूस हो रही थी.
मास्टरजी की बात वह टाल नहीं सकता था, और शहर वह जाना नहीं चाहता था.
उसने कई दिन इसी उधेड़बुन में गुज़ार दिए, मास्टरजी से भी आँख बचा कर रहने लगा.
फिर एक दिन झल्ला कर वह उठा और उस सफ़ेद चौखटे को रंगने बैठ गया, पहले तो वह बहुत कसमसाया परन्तु एक बार रंगों को हाथ लगाते ही मानो उसमे एक बदलाव सा आ गया, वह एकदम शांत चित्त हो उसपे रंग फेरने लगा.
आखिर नए साल की सुबह आ ही गयी, वह बहुत बुझे मन से मास्टरजी के पास सुबह-सुबह पहुंचा, उसे रात भर नींद ही नहीं आई थी .
वह मन ही मन सोच रहा था की मास्टरजी ने उसे किस झमेले में डाल दिया.
जब मास्टरजी ने उसे नए साल की बधाई दी, तो वो डरते-डरते बोला,” बाबूजी क्या जरुरी है की हम शहर जायें , आपके कहने पर हमने रंग तो जरूर किया है, पर हम शहर नहीं जाना चाहते, और फिर हमे तो ठीक ठीक ये भी नहीं पता कि कहाँ जाना हैं”
परन्तु मास्टरजी के आगे उसकी एक भी न चली, उन्होंने उसे एक कागज के टुकड़े पर कुछ लिख कर दे दिया, और कहा की उसे शहर में किसी को भी दिखा दे, उसे प्रतियोगिता स्थल का पता मालूम पड़ जायेगा
आख़िरकार मजबूर होकर वह शहर की ओर चल दिया , रास्ते में उसका मन हुआ की उस चौखटे को तालाब में फेंक कर इधर- उधर घूम कर गाँव लौट जाये, परन्तु वह मास्टरजी को धोखा भी नहीं देना चाहता था.
खैर वह समय से उस जगह पहुँच गया जहाँ प्रतियोगिता आयोजित की गयी थी, वह किसी तरह डरते डरते अन्दर गया.
“क्यों भैया तुम्हे भी प्रतियोगिता में हिस्सा लेना है”, एक आदमी उस से बोला.
‘हा .. जी .. जी.. “, वह सकपका गया .
“तो ऐसा करो की वहां जो लड़का बैठा है उसे ये चित्र दे दो और अपना नाम लिखवा दो”, वह आदमी बोला
सोमी उस आदमी के बताये अनुसार गया.
“नाम”, वह लड़का कड़क के बोला.
“सो… स ..स… सोमदेव”, उसने शायद ये नाम ज़िन्दगी में पहली बार बोला.
“ठीक है, ये चित्र यहाँ रख दो और ये कागज संभाल के रखो, मांगने पे देना, अभी से ठीक दो घंटे के बाद जीतने वाले का नाम घोषित किया जायेगा”, उस लड़के ने समझाया.
सोमी वहां से चलकर सबसे दूर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया, उसके समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे, मैदान में आने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी.
उसके लिए वहां बैठना मुश्किल होता जा रहा था, तेज़ दौड़ती मोटरगाड़ियों की पो- पो से, वो सहम जाता. शहर के इस शोर – शराबे में वह क्यों मूर्खो की तरह बैठा है उसे समझ ही नहीं आ रहा था,
उसके दिल की धड़कन यह सोच के और बढ़ी जा रही थी कि, कहीं अगर इन लोगों को पता चल गया की वह गाँव से यहाँ किस लिए आया है तो सब उसपर हसेंगे.
इसी उधेड़बुन में दो घंटे बीत गए , फिर उसे एक आदमी की जोर – जोर से आवाज़ सुनाई देने लगी, वह कह रहा था की विजेता का नाम कुछ ही देर में घोषित किया जायेगा, इसलिए हिस्सा लेने वाले सभी लोग मैदान के बीच में आ जायें.
परन्तु सोमी इस वक्त डर के मारे कांप रहा था, कि कहीं उसे ज़बरदस्ती न पकड़ के ले जाया जाये, क्योंकि हिस्सा तो वह भी ले रहा था .
उसे इस वक़्त अपने ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था की वह आया ही क्यों, वह कैसे इतने सारे लोगो के बीच जाये.
इस बीच फिर से उस आदमी की आवाज़ गूंजी , ” प्रिय भाइयो और बहनों इस वर्ष के विजेता का नाम है …. सोमदेव”
पूरा मैदान तालियों की गडगडाहट से गूँज उठा.
और इधर सोमी था कि, उसे काटो तो खून नहीं, उसने जैसे ही अपना नाम सुना, वह तीर की तरह भागा और एक सांस में ही उसने अपने गाँव की और दौड़ लगा दी..
मैदान में आवाज़ गूँज रही थी,’ सोमदेव- सोमदेव…’, परन्तु सोमदेव होता तब तो मिलता.
वहाँ था, तो सिर्फ सोमी, जो बेतहाशा गाँव की और भागा चला जा रहा था.