सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

शाहदत ,बलिदान और लाखो कुर्बनिओं के बाद हिंदुस्तान की स्वराज्य मिला ,हमारा दुर्भाग्य कंहे या उपेक्षा करने की आदत हमे इस स्थिति में ले आई है की हमारे पास शहीदों के लिखे पुस्तक उपलब्ध नहीं है ,पता नहीं सरकार के अभिलेख में सरे शहीदों का नाम भी है या नहीं खैर आज हम बात कररहे है १९ दिसम्बर की,१९-dec -१९२७ हमारे ३ क्रन्तिकारी शहीद हो गए थे गोरखपुर जेल में .उन्हें सजा दी गयी थी फांसी की ,अंग्रेजी सरकार ने वजह बताई थी की काकोरी कांड. अंग्रेजी सरकार के हिसाब से इनलोगों ने सरकारी खजाना लुटा था .जबकि अगर भारतियों के हिसाब से देखे तो जो खजाना अंग्रेजी सरकार लुट के ले जा रही थी वो भारतीयओं ने छुड़ाने के कोशिश की थी .

१९ dec को हुई फांसी की वजह काकोरी कांड ,और काकोरी कांड की वजह ?????? शायद उस समय की न्यायिक व्यवस्था ने जानने की कोशिश नहीं की या जानते हुए उसकी उपेछा केर दी गयी .
जैसा की आज भी हमारी आदत है की हम जुर्म होने के पीछे की वजह को जानने की कोशिश नहीं करते ,बस जुर्म करने वाले को पकड़ कर अपनी पीठ थप थापा लेते है .काकोरी कांड के पीछे की वजह अगर हम उधेरना शुरू करें तो न जाने कितने नाम निकलेंगे ,न जाने कितने षड्यंत्र का जिक्र करना होगा .अगर हम इतना जान ले की पुरे प्रक्रिया में ये ध्यान रखा गया था की कोई आहात न हो फिर भी दुर्भाग्य वश एक मनचले नव युवक की वजह से एक इंसान को गोली लग गयी थी .

सिर्फ दस नवयुवकों ने जिन्होंने पिछले कई हाथो से खाना नहीं खाया था ,उन्होंने इस कार्य को अंजाम दिया था .और अंग्रेजी सरकार ने लूट की योजना बनाने के कारन श्री राम प्रसाद बिस्मिल ,श्री अशफाकउल्ला खां वारसी ,श्री ठाकुर रोशन सिंह,श्री राजेन्द्र लाहिरी जैसे लोगों को फांसी देदी जबकि उस समय सांप्रदायिक दंगो में जिन लोगों ने कई लोगों का खून बहाया था उनको माफ़ी देदी .वैसे तो हम सब लोग अंग्रेजो के दोहरी मानसिकता को भली भांति जानते हैं फिर भी हमने हाल ही में FDI को मंजूरी दे दी .इन शहीदों ने ना सिर्फ अंग्रजी सरकार को चुनोती दी थी ,सरकार के साथ साथ हर उस प्रथा को ललकारा था जो मालिक और नौकर बनती थी .इनका सपना सिर्फ आजाद भारत नहीं था और ये न ही उस टाइप के लूग थे जो की कंही से हथियार प्राप्त केर लिया और चले क्रांति ,क्रांति खेलने.

इनमे एक था कट्टर आर्य समाजी और एक खान साहब ,अंग्रेजो को डर था इनकी दोस्ती से .
अंग्रेज डरते थे की कंही ऐसी दोती हर गली में हो गयी तो उनका क्या होगा ,इसलिए इन लोगों को जन्हा तक हो सके अलग अलग जेल में रखा गया था .और न ही ये ऐसे युवक थे जिन्हें पढने का दिल न किया और चले गए अवार्गर्दी करते करते क्रांति करने .बिस्मिल जी ने बहुत पुस्तकें लिखी है हिंदी और उर्दू में .और ऐसा भी नहीं था की इनके सब साथी पुरे इमानदार और देश भक्त थे नहीं टी बिस्मिल कभी ये नहीं कहते की
जिन्हें हम हार समझे थे गला अपना सजाने को,
वही अब नाग बन बैठे हमारे काट खाने को !

उनकी ये भी न चाहत थी की सरे साथी उनके हुक्म के गुलाम बनके रहे ,या उनको बचाने के लिए अपना सब घर परिवार छोड़ दे वो तो कहते थे की
वह फूल चढ़ाते हैं, तुर्बत भी दबी जाती ।
माशूक के थोड़े से भी एहसान बहुत हैं ।
काकोरी कांड के सरे अभियुक्त बा इज्जत बरी हो जाते अगर बनारसीलाल अपनी देश भक्ति में निष्ठा रखते ,इनके धोके ने सरे संघठन को गर्त में पहुंचा दिया और दिल को मजबूत रखने के लिए कहा जाने लगा
सताये तुझको जो कोई बेवफा, ‘बिस्मिल’ ।
तो मुंह से कुछ न कहना आह ! कर लेना ॥
हम शहीदाने वफा का दीनों ईमां और है ।
सिजदे करते हैं हमेशा पांव पर जल्लाद के ॥

सरकार की इच्छा थी कि उन्हें घोटकर मारे इसलिए उन्हें ऐसी अवस्था में रखा गया था की आत्मा भी कुंहक उठे । इसी कारण गरमी की ऋतु में साढ़े तीन महीने बाद अपील की तारीख नियत की गई । साढ़े तीन महीने तक फांसी की कोठरी में भूंजा गया । यह कोठरी पक्षी के पिंजरे से भी खराब थी । गोरखपुर जेल की फांसी की कोठरी मैदान में बनी हुई थी । किसी प्रकार की छाया निकट नहीं । प्रातःकाल आठ बजे से रात्रि के आठ बजे तक सूर्य देवता की कृपा से तथा चारों ओर रेतीली जमीन होने से अग्नि वर्षण होता रहता था । नौ फीट लम्बी तथा नौ फीट चौड़ी कोठड़ी में केवल छः फीट लम्बा और दो फीट चौड़ा द्वार था । पीछे की ओर जमीन के आठ या नौ फीट की ऊंचाई पर एक दो फीट लम्बी तथा एक फुट चौड़ी खिड़की थी । इसी कोठरी में भोजन, स्नान, मल-मूत्र त्याग तथा शयनादि होता था ।
पर बिस्मिल जी का कहां था “इस कोठरी में मछर अपनी मधुर ध्वनि रात भर सुनाया करते हैं । बड़े प्रयत्‍न से रात्रि में तीन या चार घण्टे निद्रा आती है, किसी-किसी दिन एक-दो घण्टे ही सोकर निर्वाह करना पड़ता है । मिट्टी के पात्रों में भोजन दिया जाता है । ओढ़ने बिछाने के दो कम्बल हैं । बड़े त्याग का जीवन है । साधन के सब साधन एकत्रित हैं । प्रत्येक क्षण शिक्षा दे रहा है – अन्तिम समय के लिए तैयार हो जाओ, परमात्मा का भजन करो ।मुझे तो इस कोठरी में बड़ा आनन्द आ रहा है । मेरी इच्छा थी कि किसी साधु की गुफा पर कुछ दिन निवास करके योगाभ्यास किया जाता । अन्तिम समय वह इच्छा भी पूर्ण हो गई । साधु की गुफा न मिली तो क्या, साधना की गुफा तो मिल गई । इसी कोठरी में यह सुयोग प्राप्‍त हो गया कि अपनी कुछ अन्तिम बात लिखकर देशवासियों को अर्पण कर दूं । सम्भव है कि मेरे जीवन के अध्ययन से किसी आत्मा का भला हो जाए । बड़ी कठिनता से
यह शुभ अवसर प्राप्‍त हुआ ।”
महसूस हो रहे हैं बादे फना के झोंके |
खुलने लगे हैं मुझ पर असरार जिन्दगी के ॥
बारे अलम उठाया रंगे निशात देता ।
आये नहीं हैं यूं ही अन्दाज बेहिसी के ॥
वफा पर दिल को सदके जान को नजरे जफ़ा कर दे ।
मुहब्बत में यह लाजिम है कि जो कुछ हो फिदा कर दे ॥

उनका मानना था की कोई भी क्रांति लाने से पहले लोगों के उदर पूर्ति होना जरूरी है ,क्यूंकि भूखे पेट क्रांति की बातें बईमानी लगती है .तो उनका कहना था की “जिनके हृदय में भारतवर्ष की सेवा के भाव उपस्थित हों या जो भारतभूमि को स्वतंत्र देखने या स्वाधीन बनाने की इच्छा रखता हो, उसे उचित है कि ग्रामीण संगठन करके कृषकों की दशा सुधारकर, उनके हृदय से भाग्य-निर्माता को हटाकर उद्योगी बनने की शिक्षा दे ।” सामान सामाजिक अधिकार की बातें करें ,किसानो को उनके बहले की बात समझाएं ,हेर तबके के लोगों को जागरूक करें क्यूंकि क्रान्ति का नाम ही बड़ा भयंकर है । प्रत्येक प्रकार की क्रान्ति विपक्षियों को भयभीत कर देती है । जहां पर रात्रि होती है तो दिन का आगमन जान निशिचरों को दुःख होता है । ठंडे जलवायु में रहने वाले पशु-पक्षी गरमी के आने पर उस देश को भी त्याग देते हैं । फिर राजनैतिक क्रान्ति तो बड़ी भयावनी होती है । मनुष्य अभ्यासों का समूह है । अभ्यासों के अनुसार ही उसकी प्रकृति भी बन जाती है । उसके विपरीत जिस समय कोई बाधा उपस्थित होती है, तो उनको भय प्रतीत होता है । इसके अतिरिक्‍त प्रत्येक सरकार के सहायक अमीर और जमींदार होते हैं । ये लोग कभी नहीं चाहते कि उनके ऐशो आराम में किसी प्रकार की बाधा पड़े । इसलिए वे हमेशा क्रान्तिकारी आन्दोलन को नष्‍ट करने का प्रयत्‍न करते हैं । इसलिए लोगों का जागरूक होना बहुत जरुरी है फिर आएगी क्रांति .

कभी कभी तो लगता है की इन शहीदों के बलिदान का कोई असर नहीं हुआ ,कहते है की कोई व्यवस्था किसी इंसान को मर सकती है ,सोच को नहीं ,लेकिन आज तो इन शहीदों की सोच को भी मरने की साजिश की जा रही है जब की आज भी वही अराजकता फैली है .अगर हम सच में एक सवर्निम प्रगति के बारे में सोचते है तो हमारे सरे शहीदों की सोच को प्रयोग में लाना होगा ,एजुकेशन सिस्टम में ये सारी बातें बतानी होगी की हम क्या थे ,और आज हम क्या हैं ,क्यूँ है .क्या हम आज की व्यवस्था को अपनाने के लिए मजबूर है या फिर कोई और चारा है .

न जाने कब हम बिस्मिल ,आजाद ,अशफाक ,भगत सिंह ,सुखदेव जैसे भारत माता के बेटों की बलिदों को सार्थक केर पाएंगे .

रामप्रसाद बिस्मिल जी का अंतिम सन्देश था ”
देशवासियों से यही अन्तिम विनय है कि जो कुछ करें, सब मिलकर करें और सब देश की भलाई के लिए करें । इसी से सबका भला होगा ।”

मरते ‘बिस्मिल’ ‘रोशन’ ‘लहरी’ ‘अशफाक’ अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैंकड़ों इनके रुधिर की धार से ॥
– रामप्रसाद ‘बिस्मिल’

“जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा, जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा?
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊँगा”.
जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ;
हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा, और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा.”
-अशफाकउल्ला खां वारसी

Author : Vivek Kumar

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