तिरंगे की आत्म कथा
अपने सामने लाखो करोड़ों लोगों को झुकते , अकड़ते , गर्व महसूस करते देखा है किसी के लिए भगवान किसी के लिए शान तो किसी के लिए ईमान हूँ मैं .. इतने लोगों की भावनाओं का प्रतीक बन मुझे फक्र होता है लेकिन उस दिन मुझे सिरहाने रखकर सोये उस मासूम को सुबह उठने पर जब मैं नहीं मिला तो वो रोने लगा बड़ा अजीब लगा , खैर माँ आई और उसके पूछने पर सड़क के कोने वाले कूड़े के ढेर की तरफ इशारा कर दिया … बेतहाशा भाग कर उसने मुझे उठाकर सीने से लगा लिया और उसी मनोयोग उत्साह से मुझे अपने नन्हे नन्हे हाथों से लहराने लगा जैसे कल लहरा रहा था .. शाम हो गयी पर आज किसी ने लड्डू टाफी देना तो दूर उसकी तरफ देखा भी नहीं ..वो नन्ही जान उदास हो गया शायद नाराज भी .. लगा अब वो भी मुझे फेंक देगा लेकिन उलट इसके , उसने मुझे सहेज कर रख लिया .. अब उसे ‘ अपना ‘ लगा था मैं , क्योंकि तिरस्कार और कूड़े के ढेर पर फेंके जाने का दर्द वो समझता था शायद … – एक तिरंगे की आत्म कथा
