“मम्मी, क्लास में सब कोट (ब्लेजर) पहन के आते है, अब तो मुझे भी जाड़ा होने लगा है, कोट ला दो ना प्लीज,” सौरभ लगभग रुआंसा हो गया |
“बेटा एक-दो दिन की ही तो बात हैं, फिर तो छुट्टिया ही पड़ने वाली है,” माया बोली |
“मम्मी, मैडम रोज डांटती है | आज तो क्लास से भी बाहर निकाल दिया था,” सौरभ लगभग चिल्लाते हुए बोला |
माया, खीज भरे स्वर में “कहा से ला दू कोट, तेरे पापा को पैसे ही नहीं मिले है अब तक…”, ये कहते कहते वो रुक गयी और बीते दिनों की सारी तस्वीरे उसके आँखों के सामने तैरने लगी |
किस तरह जोड़-तोड़ कर इस बार सौरभ की फीस भरी थी उसने, और किस तरह घर का किराया दिया था, और अब स्कूल वालो की ये कोट की डिमांड, बजट इस बार भी खतरे के निशान को पार कर गया था |
(सौरभ के पापा, ट्रक ड्राईवर है | अमूमन हर पिता की तरह, इन्होने भी सौरभ को अच्छे स्कूल में पढ़ा-लिखा कर, उसे बड़ा आदमी बानाने का सपना देखा है | मध्यमवर्गीय और अति-मध्यमवर्गीय परिवारों की यही परेशानी है, बच्चो की आँखों से माँ-बाप अपना सपना देखते है | काफी हद तक तो ये तर्कसंगत है, परन्तु बच्चे पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है इस विषय में शायद ही कोई सोचता हो | परेशानी ठेलकर ये लोग बच्चो का दाखिला तो प्राइवेट स्कूल्स में करा देते है, परन्तु प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से होने वाले भेदभाव का उन्हें ज्ञान नहीं होता | )
प्राइवेट स्कूल्स में दाखिला करवाने का एक कारण ये भी है की सरकारी विद्यालयों में पढाई का स्तर कुछ कम है, मै ये तो नहीं कहता की प्राइवेट स्कूल्स अप-टू-द-मार्क पढाई करवाते है, लेकिन एक चीज़ साफ़ तौर पर कहूँगा की वहा माहौल कुछ हद तक पढाई करने लायक होता है |
नोट- उपरोक्त कहानी, सच्ची घटना पर आधारित है, इस लेख का उद्देश्य मध्यमवर्गीय परिवारों की परेशानियों का एक पहलू उजागर करना है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं | इस लेख का उद्देश्य प्राइवेट और सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था पर कोई भी जजमेंट और टिप्पणी करना नहीं है | ये लेखक के अपने विचार है और उनके अनुभवों पर आधारित है |
-शुभम् भट्ट (फ़कीर)
