काश तुम भी समझ पाते

काश तुम….

 मै क्या सोचता हूँ,

क्या महसूस करता हूँ,

जी होती अगर मेरी जिन्दगी,

देखी होती अगर गरीबी,

भूखे पेट अगर तुम भी सोये होते,

तपती गर्मी मे नंगे पैर मीलों चले होते,

 

बारिश मे अगर बिन छ्त्त सोये होते,

और सर्दी मे नंगे बदन रोये होते,

तो तुम भी समझ पाते,

मै क्या सोचता हूँ,

रास्ते मे पडे एक रुपये की कीमत समझ जाते,

कचरे से मिले टूटे खिलौने फिर तुमहे भी पसन्द आते,

अपनी माँ के आँसू रोकना तो चाहते,

पर रोक ना पाते,

तुम्हारे सपने भी सिमट के रह जाते,

हर किसी की ओर उम्मीद की टकटकी लगाये देखते रहते,

और कुछ ना मिलने पर तुम भी दुखी हो जाते,

जब हर कोई हसता तुम पर,

तो तुम भी दर्द दिल मे छुपा लेते,

और झूठी मुस्कान होठों पर सजा लेते,

काश तुम भी समझ पाते,

मै क्या सोचता हूँ…..

watch the video of this poem

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *