सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परम्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रुप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रुप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनपढ़ और क्रूर। प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जैन वाङ्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही कथा का रूपान्तर है भगवान आदिनाथ के दो पुत्र सत्ता के मोह में पड़कर एक-दूसरे को पराभूत करने की भावना ही मानव संस्कृति का अवमूल्यन है। भरत और बाहुबली की यह कहानी तब से आज तक अपने को दोहराती आ रही है। आज सत्ता और सेवा एक-दूसरे के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं। लेकिन वे एक-दूसरे का विकल्प हो ही नहीं सकते। सत्ता का लक्ष्य पाना और छीनना है और सेवा का लक्ष्य देना और अपने को विसर्जित करना है।
आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएँ मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमनें ? कहाँ पहुँचे हम ? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
भरत और बाहुबली इसी मुक्ति की चाह के लिए व्याकुल थे और वह तब मिली थी जब वे ‘मैं’ से मुक्ति पा सके थे और मान गये थे कि ‘कौन मैं’ कौंन तू’ सब सबके’ और यह भी अहंकार से मुक्त होकर ही तप पूर्ण होता है और तप के चरणों में झुककर ही सत्ता पवित्र होती है।
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