सत्ता के आर-पार – विष्णु प्रभाकर

सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परम्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रुप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रुप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनपढ़ और क्रूर। प्रस्तुत नाटक लिखने का […]