पुस्तक के कुछ अंश
‘लेकिन डॉन ! कहानी तो है ही नहीं।’ मैं मिनमिनाया। घिग्घी जैसी चीज, जो मेरे शरीर में जहाँ रही होगी, वह बँधी हुई थी।
‘तो लिखो ! अभी।…और फोन ज़रा कुमकुम को पकड़ाओ।’ डॉन उधर से दहाड़ा। मैंने फोन अपनी पत्नी को पकड़ाया।
‘उसे कमरे में बंद कर दो, और बाहर से ताला लगा दो। आजकल जबसे वह आध्यात्मिक हुआ है, इधर-उधर के चक्कर लगाने लगा है। इधर से मैं देखता हूँ, उधर से तुम सँभालो।’ गेस्टापों का चीफ लगते इस डरावने नारीवादी ने पत्नी के दाँत चमका दिये। अगले ही पल वह किसी, ‘वायर’ में बदल गयी। तो शुरू हुई कहानी ‘पीली छतरी वाली लड़की।’ सोचा था एक या दो अंक में खत्म हो जायेगी। जब-जब मैं इसे खत्म करता, उधर से डॉन दहाड़ता और इधर मैं ताले के भीतर बंद कर दिया जाता।
आखिरकार एक दिन, दिसम्बर के महीने में, आधी रात में कहानी खत्म मैंने की और कमरे का ताला तोड़कर राजधानी एक्सप्रेस से शहर ही छोड़कर फरार हो गया।
अभी जब आप यह कहानी पढ़ रहे होंगे, मैं राजधानी के बर्थ नंबर 42 पर ही हूँ।
और बर्थ नंबर 41 पर है अंजली। यानी अंजली जोशी। यानी पीली छतरी वाली लड़की।
लेकिन याद रखें यह लंबी कहानी है, उपन्यास नहीं। इतने सारे पृष्ठों के बावजूद इसमें से जो चीज अनुपस्थित है, वह है ‘औपन्यासिकता’ या ‘एपिकैलिटी ’।
यह तो इसी समय और इसी यथार्थ में अभी भी जिये जा रहे जीवन का एक ब्यौरा भर है।
एक अनिर्णित आख्यान का एक टुकड़ा।