प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
भारतीय जन-जीवन के परम्परागत पैटर्न में दो रूपान्तरण आज हो रहा है उसकी समग्र अनुभूति प्राप्त करने की चेष्टा ही प्रिया नीलकण्ठी के निबन्धों की सृजन-प्रेरणा है। इस रूपान्तरण में ग्राम-संस्कृति के सूखते रस-बोध का स्थान यन्त्र-युग की बौद्धिकता लेती जा रही है,जिसने आज के व्यक्ति को अभिशप्त और निर्वासित जीवन जीने के लिए विवश किया है। यह सत्य है कि औद्योगिक संस्कृति के विकास के साथ साथ बौद्धिकता का दायरा बढता जायगा, किन्तु ग्रामीण जीवन की उल्लास साधना इतनी हेय और उपेक्षणीय नहीं कि इसे सूखने दिया जाय।
गूलर के फूल
(एक अरण्य-कथा)
‘‘गूलर का फूल होता है क्या ?’’ बक ने अपने मित्रों की ओर चोंच करके प्रश्न किया।
आज फिर काक, बक और उलूक तीनों मित्र काम्यक वन की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर स्थित गूलर के वृक्ष के नीचे इकट्ठे हुए। बगल में ही निर्मल जलवाली पुष्करिणी है जिसमें महाभाग युधिष्ठर स्नान किया करते थे। स्नानोपरान्त कभी-कभी वे इसी गूलर के नीचे बैठकर सहस्रशीर्षा पुरूष विष्णु का ध्यान किया करते थे। और जब कभी-कभी यह ध्यान अति दीर्घकालीन हो जाता और धर्मराज की ललाट पर अरूण तिलक करनेवाली किरणें उनकी पीठ पर पड़ने लगतीं तो भीमसेन भूख से झटपटाकर बेमतलब द्रोपदी से लड़ बैठते थे और नकुल-सहदेव बार-बार देखकर लौट जाते कि भैया की पूजा समाप्त हुई या नहीं। यह गूलर का वृक्ष अति पुरातन था। द्वापर से पूर्व, त्रेता से भी पहले, जब नारायण ने जगत् के उद्धार के लिए नृसिंह वपु धारण किया था तब यह वृक्ष अपनी कुमारावस्था में था। पास ही पार्श्व में एक कटहल का एक नवीन वृक्ष महाबाहु भीमसेन से आरोपित कर दिया था। महापराक्रमी वायुपुत्र लघु आकार वाले फलों को अवेलना की दृष्टि से देखते थे।
यह सत-युगी वृक्ष पुरूष युगों के ज्वार भाटे के बीच मौन साक्षी-सा खड़ा रहा। श्रृंगार, वीर, करूणा आदि नवरसों से परे इसका संन्यासी मन भी कभी-कभी अतीत-माधुरी की स्मृति में विगलित हो उठता था। विशेषतः रात्रि की नीरवता में द्रौपदी की करूणा का उसे ध्यान हो जाता, तो इस युगों में वृद्ध सहचर के हृदय की चीरती हुई एक लम्बी साँस निकल जाती।इस ‘श्वेत वाराह-कल्पे, कलियुगे’ प्रथम चरण के मध्य में सहस्रानीक अर्जुन के वशंज उदयन का कौशाम्बी में, प्रसेनजित् का अवध में एवं अजातशत्रु का मगध में राज्य चल रहा था, एवं विष्णु के बौद्धावतार का पदार्पण हो चुका था, काम्यक वन की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर स्थित इसी गूलर के पेड़ के नीचे बक ने काक और उलूक से पूछा-‘‘गूलर में फूल लगता है क्या ?’’
‘‘हमने तो कभी नहीं देखा भाई! उड्डीन-पड्डीन आदि सताधिक गतियों से ससागरा धरा को कई बार माप डाला पर गूलर का फूल कहीं नहीं मिला। परन्तु मैं दिन की बात कह रहा हूँ। रात की बातों का विशेषज्ञ तो मित्र उलूक है। पूछ कर देखो।’’
‘‘क्यों बन्धु, कुछ इस पर प्रकाश डाल सकते हो ? तुम्हें तो अन्धकार की मायाविनी गतियों का भी परिचय है ।’’
उलूक ने शान्त भाव से उत्तर दिया, ‘‘देखा तो मैंने कभी भी नहीं और न कभी अनुसन्धान करने की चेष्टा ही की। पर बड़ी अचरज की बात है ! भला बिना फूल के फल कैसा होगा ?’’
आज फिर काक, बक और उलूक तीनों मित्र काम्यक वन की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर स्थित गूलर के वृक्ष के नीचे इकट्ठे हुए। बगल में ही निर्मल जलवाली पुष्करिणी है जिसमें महाभाग युधिष्ठर स्नान किया करते थे। स्नानोपरान्त कभी-कभी वे इसी गूलर के नीचे बैठकर सहस्रशीर्षा पुरूष विष्णु का ध्यान किया करते थे। और जब कभी-कभी यह ध्यान अति दीर्घकालीन हो जाता और धर्मराज की ललाट पर अरूण तिलक करनेवाली किरणें उनकी पीठ पर पड़ने लगतीं तो भीमसेन भूख से झटपटाकर बेमतलब द्रोपदी से लड़ बैठते थे और नकुल-सहदेव बार-बार देखकर लौट जाते कि भैया की पूजा समाप्त हुई या नहीं। यह गूलर का वृक्ष अति पुरातन था। द्वापर से पूर्व, त्रेता से भी पहले, जब नारायण ने जगत् के उद्धार के लिए नृसिंह वपु धारण किया था तब यह वृक्ष अपनी कुमारावस्था में था। पास ही पार्श्व में एक कटहल का एक नवीन वृक्ष महाबाहु भीमसेन से आरोपित कर दिया था। महापराक्रमी वायुपुत्र लघु आकार वाले फलों को अवेलना की दृष्टि से देखते थे।
यह सत-युगी वृक्ष पुरूष युगों के ज्वार भाटे के बीच मौन साक्षी-सा खड़ा रहा। श्रृंगार, वीर, करूणा आदि नवरसों से परे इसका संन्यासी मन भी कभी-कभी अतीत-माधुरी की स्मृति में विगलित हो उठता था। विशेषतः रात्रि की नीरवता में द्रौपदी की करूणा का उसे ध्यान हो जाता, तो इस युगों में वृद्ध सहचर के हृदय की चीरती हुई एक लम्बी साँस निकल जाती।इस ‘श्वेत वाराह-कल्पे, कलियुगे’ प्रथम चरण के मध्य में सहस्रानीक अर्जुन के वशंज उदयन का कौशाम्बी में, प्रसेनजित् का अवध में एवं अजातशत्रु का मगध में राज्य चल रहा था, एवं विष्णु के बौद्धावतार का पदार्पण हो चुका था, काम्यक वन की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर स्थित इसी गूलर के पेड़ के नीचे बक ने काक और उलूक से पूछा-‘‘गूलर में फूल लगता है क्या ?’’
‘‘हमने तो कभी नहीं देखा भाई! उड्डीन-पड्डीन आदि सताधिक गतियों से ससागरा धरा को कई बार माप डाला पर गूलर का फूल कहीं नहीं मिला। परन्तु मैं दिन की बात कह रहा हूँ। रात की बातों का विशेषज्ञ तो मित्र उलूक है। पूछ कर देखो।’’
‘‘क्यों बन्धु, कुछ इस पर प्रकाश डाल सकते हो ? तुम्हें तो अन्धकार की मायाविनी गतियों का भी परिचय है ।’’
उलूक ने शान्त भाव से उत्तर दिया, ‘‘देखा तो मैंने कभी भी नहीं और न कभी अनुसन्धान करने की चेष्टा ही की। पर बड़ी अचरज की बात है ! भला बिना फूल के फल कैसा होगा ?’’
Image and Content Credit :- Pustak.org