हाय ये मजबूरी, हाय ये मजबूरी

हाय ये मजबूरी, हाय ये मजबूरी

 

माँ कहती है -“गाँव में जन्मी थी मैं “
बेखबर मेरे मकसद से पली-बड़ी थी मैं
उछलती-फुदकती खेल की अलग ही दुनिया बनाई
खुदकी भूख भूल पहले मुझे वो हमेशा खिलाई
मेरी माँ की थी मैं दुलार
वही थी मेरी सबसे अच्छी यार, मेरी सलाहकार
दोस्तों के बाबा देख
अपने ही बाबा का नाम जब पता न होता था
तब माँ से पूछ बैठती
पर न जाने क्यूँ वो अचानक रो पड़ती
और कहती-
” हाय ये मजबूरी, हाय ये मजबूरी ।”
माँ हमेशा चुप्प-सी, मायूस-सी रह मेरा पेट भरती रही
रोज़ाना माँ की हालत यूँ देखी न गई
तब फिर हिम्मत कर पूछ बैठी
“माँ, मेरे बाबा का नाम क्या है?”
ये सुन माँ फिर बिलखने लगी और बस, फिर बिलखती ही रही
अब इतनी तो सयानी हो गई थी मैं
कोई तो गहरा राज़ है समझ गई थी मैं
उन नमी आँखों से जब माँ ने मेरी ओर देखा
लिपट गई मैं और तपाक से बोली-
“माँ, मुझे माफ़ कर दे। बस तू खुश रह।”
फिर सहसा ही वो मुझसे बोली –
” हाय ये मजबूरी, हाय ये मजबूरी ।
किसी के लिए मजबूरी तो दूसरे के लिए सहारा।
किसी की बस यही है ज़िन्दगी।
तो किसी का शॉक और पैसे कमाने का इक ज़रिया।”
माँ के शब्द सुन मैं और उत्सुक हो बैठी
ऐसे किस रहस्य से अनजान थी मैं
जो माँ को ऐसा रुला बैठी
माँ के आँसू पोंछ मैंने दृढ़ता से कहा–
“ना जाऊँ तुम्हें कहीं छोड़कर मैं माँ,
बताओ ना अपना दुःख मुझे
जो मन ही मन खा रहा है तुझे।”
तरस गई थी माँ के लफ्ज़ सुनने को
फिर अचानक एक दर्दभरी आवाज़ में माँ बोली -“बेटा “
तब एकटक मैं बस उन्हीं की ओर देखती रही
जो राज़ था मुझसे छुपा
आज वो दिन आखिरकार आ ही गया
और तब माँ ने बोलना शुरु किया…
तेरी माँ के घर में थी इतनी गरीबी
घर में अनाज नहीं, और बाबा की अपनी ही बीमारी
पैसे कमाने का मैं ही इक ज़रिया
अनपढ़ तो थी ही
बस काम के लिए इधर-उधर भटकती रही
एक दिन गाँव के चाचा आए घर
बोले-“पैसे चाहिए तो आ जाना आज रात मेरे घर”
पगार का सुन क्या खुश थी मैं
माँ-बाबा से उत्साहपूर्ण बोली –
“बाबा, आपका इलाज कराऊँगी मैं।”
आज मेरे काम का पहला दिन था
तो समय पर पहुँचने का मैंने ठाना था
अचानक ही जब चाचा आकर करने लगे अजीब व्यवहार
तब मैं समझी मुझे किस चीज़ क लिए मिलेगी इतनी पगार
मैं मजबूर बस खुदको ही बेच बैठी
हाए ये मजबूरी ,बस खुदको ही कोसती रही
इतना यूँ करीब और इस तरह छूना
मानो जैसे मेरी रूह काँप गई हो
पर फिर पगार का लालच दे उस बंद कमरे में वो सब हुआ
जो एक वैश्या के साथ होता है
और तब एहसास हुआ मुझे
वो दर्द, वो मजबूरी
वो बेनक़ाबी एहसास
मैं बिलखती रही ,वो हँसते रहे
मैं चिल्लाती रही ,वो मज़े लेते रहे
पर मैं कुछ कर ना सकी
रातभर मेरी ही चीखें कान में पड़ते ही मानो मूक हो जाती
मेरे माँ-बाबा का ध्यान और बाबा की बीमारी
ये सोचकर फिर कुछ बोल न पाती
मेरा मन भी आसमान की बुलंदियों को छूने का था
दुसरे बच्चों की तरह स्कूल में पढ़ने का था
अपने इन सपनों को उसी रात कर डाला कत्ल
मजबूरी ने बना डाला मुझे वैश्या और पत्थर का दिल
अब यही कमाने का ज़रिया था मेरा
रोज़ अलग आदमी से मिल
ज़िन्दगी में अब कुछ बचा न था मेरा
मैं भी एक साधारण सी बच्ची
जीना चाहती थी बिल्कुल दूसरों के जैसी
पर किस्मत ने क्या खेल खेला
मुझे कहीं और ही गुमनाम रास्ते पर छोड़ डाला
धीरे-धीरे मैं खुदको ही भूल बैठी
रोज़ाना नए लोग, उन्हें समर्पित कर बैठी
न किसी को बता पाती
माँ पूछती तो बोलती-
“अच्छी पगार मिल जाती है माँ।”
मेरा दर्द भरा चिल्लाना
और उसका फिर इस कद्र छूना
मरने का मन था मेरा पर फिर माँ-बाबा…
बस, सोच कर रुक जाती और सोचती-
“भगवान, क्या पाप था मेरा?”
हाँ! मैंने अपने आपको बेच डाला था
पर फिर उम्र के बढ़ते, ये भी अब धीमा पड़ गया था
पर तू आई मेरी नन्ही सी पारी
 मेरे जीने  का इक सहारा
मेरी उम्मीद, मेरा अनमोल सितारा
कुछ भी हो तुझे ऐसे मजबूर न होने दूँ
मेरी गुड़िया को ज़िन्दगी में कुछ करने दूँ
बड़ी मुश्किल से निकल
शहर में कुछ भी कर पैसे कमाने लगी
बस फिर दिन के कुछ पैसे कमाकर तुझे स्कूल भेजने लगी
हे माँ! तू है प्रबल।
तू है सशक्त!
वो मजबूरी थी जो बना दे इंसान को सफल से विफल
अब मन से पढूंगी-लिखूंगी मैं, माँ
शपथ लेती हूँ आज-
“तेरा नाम ज़रूर रोशन कर दिखाऊँगी मैं माँ।”

About Shachi Kaul

Shachi Kaul is a web enthusiast and a compassionate writer from INDIA with utmost dedication, determination and positive attitude for serving humanity. With a coffee running through her veins, she passionately battles each day, enhancing her creativity! She enjoys in exploring different people and surfing internet like discovering some interesting websites. She spends her quality time in playing musical instruments and preparing powerpoint presentations as well.

5 Comments

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