बड़े बाबू, छोटे बाबू

बड़े बाबू, छोटे बाबू

वर्ष 1996 की बात है| पिताजी एक गवरमेंट इन्टर कालेज में कार्यरत थे, और मां एक स्कूल में टीचर| बड़े भाईसाब ने दूसरी कक्षा में सर्वप्रथम आकर तीसरी कक्षा में दाखिला लिया था, इसलिए अब हम भाई बहन की विगत अठखेलियों के प्रति उनका कुछ ऐसा रवैया हो चुका था, जैसा की चुनाव के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र वासियों के प्रति उनके प्रतिनिधियों का हो जाता है| इतना कहना काफी होगा की हमारे शरारतों के मंच पे उनकी ‘गेस्ट अपीयरेंस’ यदा कदा हो चली| हमारी बिल्ली ने कुछ दिन हमारा साथ देने की पुरजोर कोशिश करी, लेकिन मासिक भत्ते के ख़तम होने के बाद जब हम उसके लिए दूध का इंतेज़ाम न कर सके, तो उसने भी हमसे किनारा कर लिया|

बस फिर क्या था, कंचों से भरी एक पोटली और अनगिनत गांठों से जुड़े अपने मांजे को लेकर निकल जाते थे दबे पांव, जैसे हमारी गली के रात्री चौकीदार की नाक के नीचे से चंदू चोर निकल जाया करता था| अपने गली के बच्चों के साथ गुटबाजी कर दूसरी गली के गुट की पतंगे लुटने में जो मज़ा था हम उसे शब्दों में अपने मां- बाप को नहीं बता सकते थे| खैर एक सुबह जब हमें अपनी पोटली और मांजे की गुल्ली यथास्थान न मिली, तो हमें आभास हो गया की फरमान आने वाला है. फरमान आया भी तो दही जलेबी के राजसी नाश्ते के बाद, कल से आप अपने पिताजी के साथ स्कूल जाएँगे, न तारीख मिली न प्रतिवादी वकील और बिना किसी सुनवाई के हमें बस फैसला सुना दिया गया.

पिताजी अपनी साइकिल पे हमको रोज़ स्कूल ले जाने लगे| वैसे साइकिल पे पीछे बैठने का आनंद सिर्फ उलटे बैठ कर आता है, यह बात हमारे पिताजी को तब पता चली, जब साथ के कुछ मास्टरों ने उनसे पूछा. “क्यूँ बड़े बाबू, ये रोज़ अपनी बिटिया को उलटे बिठा के क्यूँ लाते हैं?” पिताजी को बात खल गयी और हमें आगे के हैंडल पर नयी गद्दी पे ट्रान्सफर कर दिया गया, हमने भी गुस्से में आकर साइकिल की घंटी खराब कर दी, तो पिताजी भी हमसे से दो गज आगे, राहगीरों को रास्ते से चिल्ला चिल्ला के हटाने का काम घंटी के एवज में हमें सौंप दिया गया.

हम महीने भर पढने का स्वांग करते, पहाड़े रटते, और बच्चों की पर्चियां पकड़ते, पेड़ों पर चढ़ते या स्कूल के पीछे वाले तालाब में पत्थर उछालते| लेकिन हमें सबसे ज्यादा इंतज़ार रहता महीने की आखरी तारीख का जब पिताजी महिने का लेखा जोखा बड़े ऑफिस में जमा करने नैनीताल हेड ऑफिस जाते थे| तब पिताजी के साथ साथ हम भी लग लेते, नंदी की तरह| अपने नन्हे नन्हे क़दमों से उनके फर्लांग जैसे क़दमों का पीछा करते करते. आधा रास्ता चल कर, इक चौथाई दौड़ कर और बाकी हांफ हांफ कर तय करते थे, क्यूंकि हमको वो हेड ऑफिस बहुत अच्छा लगता था| जब पहली बार पिताजी हमको वहाँ ले गए, तब हम बस एक-टक हर चीज़ को देखते रहे. वो चाय के गिलास, टाइप राइटर की सुरीली टिक टिक, पुराने डाक्यूमेंट्स की खुशबू और सरकारी कर्मचारियों के पान चबाते चबाते गुनगुन करने ने जैसे हमारा मन सा मोह लिया| हमने पिताजी से पूछा की “यह कब तक खुला रहता है?” क्या पता शायद हम एक रात यहाँ रुक जाये, रात को उस टिक टिक को सुनते सुनते सोने में कितना मज़ा आयेगा और साथ ही दूध पीने से भी बच जाएँगे, पर पिताजी ने कहाँ “पांच बजे!” हम उनका मूंह देखते रहे फिर उन्होंने हमको एक बड़ी सी घडी की तरफ इशारा करते हुए कहा की जब वो छोटा काँटा पांच पर आये तब, और हम मन मसोस कर अपने सरकारी ऑफिस के दौरे पे निकल गए.

पुरे ऑफिस के चक्कर काटते, लोगों से पुच्कारियां और टाफियां लेते लेते 3 घंटे कैसे गुज़र गए पता ही नहीं चला| अचानक लोग अपना सामान समेटने लगे, कुछ ने तो अपने टाइपराइटर भी ढक दिए| हमें पहले उदासी ने घेरा, और फिर क्रोध ने अभिभूत कर दिया, पता नहीं किस अनुशासित बाबू का भूत हमको लगा की अपनी सबसे बुलंद आवाज़ में चिल्लाये, “क्यूँ! बज गए पांच?” वो दिन है और आज का दिन है, हमारे पिताजी अभी भी बताते नहीं थकते की कैसे सारे लोग चुप चाप हमें देखने लगे और कुछ तो अपनी सीटों पे वापस जा के बैठ गए| हमें पूरा विशवास है उनकी इस कहानी में क्यूंकि हमें अभी भी याद है वो चाय जो हमें उस दिन के बाद हर बार वहाँ जाने पे ऑफर की जाने लगी.
उस दिन जब वापस आकर, थकान से चूर चूर होकर अपने तकिये को सर लगाया तो सपने में सिर्फ पान, चाय के गिलास और टाइप राइटर की टिक टिक के अलावा कुछ न सुनाई दिया, न नज़र आया| उसके बाद से हम मां के गिलास से चाय चुराने लगे, चाय पीके काले हो जाने का भी डर न था| हर त्योहार पे घरेलू सामान की लिस्ट में टाइप राइटर शामिल करने की जिद्द करते और तो और कई दिन पान की दुकान के इर्द गिर्द पाए जाने पर खूब पिटाई भी हुई, पर फिर भी हर दिन हम वही पहुँच जाते, करते भी तो क्या, कंचो से मोह छूट गया था और सरकारी बाबू बनने की तमन्ना हमारे अंतर्कर्ण में घर कर गयी थी.

About Dimple Negi

sees the world from her own tinted sunglasses, loves reading and is fearless to the point of being neurotic sometimes. The peculiar work title comes from the ability of never being able to sit calmly and always looking for ideas and inspirations in everyday life. When not buried in a pile of books or writing off the hook, you will mostly find her on street with a camera and her beloved cat 'Tipsy'

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