नारी सशक्तीकरण

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”
उपरोक्त सिधान्त को मानाने वाला हमारा भारत देश आधुनिकता के दौर मे कहीं खो गया है ।नारियो को देवियों के रूप मे पूजने वाला मनुष्य नारी को अपने कदमो तले रौंद रहा है,उसकी आबरू को तार -तार कर रहा है,उसके जन्म लेने से पहले उसके अस्तित्व ह़ी समाप्त कर देता है।आज मानवता का ऐसा पतन हो गया है की मनुष्य उस औरत पर अत्याचार कर रहा है -जो एक माँ है जो हर पीड़ा सहकर आपने औलाद को हर दुःख
से दूर रखती है ,वो एक बहन है जो उसके कलाई पर राखी बाँधकर कर उसके लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती है ,वो एक अर्धांगिनी है जो आपने पाती के हर दुःख-सुख मे उसके साथ रहती है ।अगर आज की हालत देखते हुए मै नारी को दोयम दर्जे का नागरिक कहूँ तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।ये पंक्ति नारी की पीड़ा को दर्शाता है “नारी तेरी यहीं कहानी ,आँचल मे दूध और आँखों मै पानी ” |

आधुनिक भारत मे हम नारी सशक्तीकरण की बातें करते है पर इस नारी सशक्तीकरण के कई पहलु मेरे सामने नजर आते है ।पहला पहलु ऐसी नारियो से जुड़ा है जो पेज -3 पार्टियों मे जाती है,शानदार समाहरो मे शिरकत करती है , अच्छे -अच्छे परिधान पहन कर बरी गारियों मे घुमती है और नारी के सशक्त होने का परमान मान लेते है । मे खिलाफ नहीं हूँ परन्तु क्या नारी सशक्तीकरणकी ये परिभाषा सही है ?मेरे ख्याल से ये नारी सशक्तीकरण की ये परिभाषा नहीं हो सकती जो मीडिया के हमें दिखाया जाता है।

क्या नारी सशक्तीकरण की बात करने वालों को वो नारी नहीं दिखाई देती जो ईट की भट्टी में झुलसती है, कारखानों में काम कर कर के अपने बच्चों को पालती है,अपने बच्चों को उनके पैरों पर खडा करती है ,उनकी शादी करती है। जो अपने जमीर के लिए लड़ती है ,जो समाज में रह रहे भूखे भेडियों के हैवानियत से लड़ते हुए आगे बढती है ।या जो अपनी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा कपडों पर प्रेस कर कर के अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाती है ।जो सुबह के 6 बजे से रात के 12 बजे तक काम करती रहती है ,जो बच्चों की खातिर जगती है ,उनकी फिकर करती है अपने बच्चो के उज्वल भविष्य के लिए ।
हाँ मैं सलाम करता हूँ ऐसी नारी को जो ईट की भट्टी में तपती है,ईट उठा उठा कर आगे बढती है, कपडे प्रेस कर के अपने बच्चों को पालती है ,दर्द सहती है,फिर भी उफ़ नहीं करती इस आस में कि बच्चों को पालना है आगे बढ़ाना है।शायद असली नारी सशक्तीकरण यही है ।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है की क्या देश मे जहाँ नारी सशक्तीकरण की बात होती है वहां की नारी कितनी सुरक्षित है !आज हर रोज औरतो से होने वाली छेड़-छाड़ भारतीय समाज मे शायद समस्यायों की सीमा मे नहीं आती है।हाल मे ही एक लड़की के साथ छेड़-छाड़ की इंतहा हो गयी,तो उसने सवाल किया,सवाल का जवाब उसे अपने चेहरे पर फेक मारी तेजाब के रूप मे रोज है।महिलाओ के लिए असुरक्षित माने जाने वाले देशो मे भारत ने काफी नाम कमाया है।भारत मे नैतिकता के ठेकेदार ये स्वीकार नहीं करना चाहते की जहाँ तक महिलाओ की स्थिति की बात है,तो समाज बदलने की जरुरत है।कहीं भ्रूण हत्या कहीं दहेज़ के नाम पर हत्या,कहीं बलात्कर जैसी समस्या देश भर मे व्याप्त है ।

यह समस्या देश की की सारी दामिनी की समस्या है जो पुरुष के अहम् के कारन रौंदी जाती रही है ।काश कोई इन पढे लिखे नारियो की उपेक्षा करने वालो की आँखों पर चढ़ा अहमनुमा चश्मा उतारे ताकि उन्हें नारी के वास्तविक रूप दिखाई दे ।
——————————–अनुराग कुमार

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